रचना चोरों की शामत

Wednesday, 5 February 2014

बागों बुलाती है सुबह


रात पर जय प्राप्त कर जब, जगमगाती है सुबह।
किस तरह हारा अँधेरा, कह सुनाती है सुबह।
 
त्याग बिस्तर, नित्य तत्पर, एक नव ऊर्जा लिए,
लुत्फ लेने भोर का, बागों बुलाती है सुबह।   
 
कालिमा को काटकर, आह्वान करती सूर्य का,
बाद बढ़कर, कर्म-पथ पर, दिन बिताती है सुबह।
 
बन कभी तितली, कभी चिड़िया, चमन में डोलती,
लॉन हरियल पर विचरती, गुनगुनाती है सुबह।
 
फूल कलियाँ मुग्ध-मन, रहते सजग सत्कार को,
क्यारियों फुलवारियों को, खूब भाती है सुबह।
 
इस मधुर बेला को जीने, “कल्पना” उठ चल पड़ें,
मन उतारें रंग जो, हर दिन दिखाती है सुबह। 

-कल्पना रामानी

5 comments:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.02.2014) को " सर्दी गयी वसंत आया (चर्चा -1515)" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

shashi purwar said...

bahut sundar gajal hai kalpana ji , hardik badhai aapko

कालीपद प्रसाद said...

bahut sundar !
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आशा जोगळेकर said...

वाह साक्षात सुबह साकार कर दी।

Kailash Sharma said...

अंतस को सुबह की ताज़गी से प्रफुल्लित करती बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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