रचना चोरों की शामत

Friday, 13 January 2017

पतंगों के मेले

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हवाओं का पैगाम पाकर फिज़ा से 
लगे आसमां में पतंगों के मेले। 

हुई रवि की संक्रांति ज्योंही मकर में
विजित शीत ने अपने सामां समेटे।

उड़ा जा रहा मन परिंदों की तरहा 
कि मुट्ठी में डोरी उमंगों की थामे। 

बढ़े दिन, खिली धूप ने कर बढ़ाया 
चमन में नए रंग मौसम के बिखरे। 

मनाने लगी हर दिशा पर्व पावन 
भुलाकर सभी दर्द, गुजरे दिनों के 

सखी, भेज अपनों को तिल-गुड़ का न्यौता 
चलो ‘कल्पना’ गीत गाएँ शगुन के। 

-कल्पना रामानी

Monday, 12 December 2016

शीतल ऋतु के नैन खुले

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शीतल ऋतु के नैन खुले, मौसम नैनों का नूर हुआ। 
जाग उठा जगती का कण-कण, क्षितिज सर्द सिंदूर हुआ।

बाग-बाग चहके चिड़िया से, रंग-रंग के फूलों संग
कलियों की मनुहारों से, भँवरों का मन मगरूर हुआ।     

सुविधाओं की उड़ीं पतंगेंनई उमंगें संग लिए
कुदरत हुई कृपालु सृष्टि का, दरियादिल दस्तूर हुआ।

चारु-चंद्रिका चली विचरने, शीत-निशा के प्रांगण में
सरिताओं का देख मचलना, सागर मद में चूर हुआ।

कलमों पर वो चढ़ी खुमारी, लगे झूमने गीत गजल
और कल्पनाहर सरगम-सुर, सारंगी संतूर हुआ।

-कल्पना रामानी

Wednesday, 19 October 2016

आशाओं के दीप

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आँगन-आँगन आशाओं के दीप जलाती
मन रोशन हो जाते, जब दीवाली आती

छोड़ रंज-गम हो जाता ब्रह्मांड राममय
दिशा-दिशा दुनिया की, मंगल-गान सुनाती

सपनों का नव-सूर्य, उदित होता अंबर में
और बाँचती प्रात नवल, अपनों की पाती

देख-देख कर दिव्य-ज्योत्सना, फैली जग में
प्राण-प्राण के नेह-दियों की, लौ बढ़ जाती  

तोरण सजते द्वार, अल्पना देहरी-देहरी
घर-घर को हर घरणी पावन-धाम बनाती

जब करता आह्वान जगत तब स्वर्ग-लोक से
सुख-समृद्धि के ले चिराग, लक्ष्मी उतर आती

पर्वों के अमृत से बनता जीवन उत्सव
दिल मिलते इस तरह कि जैसे दीपक-बाती  

मावस को दे मात, कालिमा काट, ‘कल्पना
दीपमालिका तीन लोक तक रजत बिछाती
   
- कल्पना रामानी

Friday, 7 October 2016

मातृ-शक्ति की छाँव

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सकल विश्व में फैली चारों ओर जीव हित।
मंगलकारी मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित।

जब-जब आती पाप-लोभ की बाढ़ जगत में
नव-दुर्गा तब प्राण हमारे करती रक्षित।  

मनता जब नवरात्रि-पर्व हर साल देश में
दिव्य प्रभा से मिट जाता सारा तम दूषित।

घटस्थापना, जगराते, माहौल बनाते
जिसमें होते सकल दुष्टतम भाव विसर्जित।

चलता दौर उपवास भजन का जब तक घर-घर
माँ देवी से माँगे जाते, वर मनवांछित।
    
देशबंधुओं, नाम देश का पर्वों से ही    
विश्व-फ़लक पर स्वर्ण अक्षरों में है अंकित।

अमर रहें ये परम्पराएँ, युगों कल्पना” 
अजर रहे यह संस्कारों की ज्योत-अखंडित। 

-कल्पना रामानी

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