रचना चोरों की शामत

Monday, 5 June 2017

बेटी बचाएँ

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ज़मीं से उठाकर फ़लक पर बिठाएँ। 
अहम लक्ष्य हो, आज बेटी बचाएँ।

जहाँ घर-चमन में, चहकती है बेटी
बहा करतीं उस घर, महकती हवाएँ।

क़तल बेटियाँ कर, जनम से ही पहले
धरा को न खुद ही, रसातल दिखाएँ।  

बहन-बेटी होती सदा पूजिता है
सपूतों को अपने, सबक यह सिखाएँ। 

पढ़ाती जो सद्भाव का पाठ जग को
उसे बंधु! बेटे बराबर पढ़ाएँ।

न हो जननियों, अब सुता-भ्रूण हत्या
वचन देके खुद को अडिग हो निभाएँ।   

है सच कल्पनाबेटी बेटों से बढ़कर
कि अब भेद का भूत, भव से भगाएँ। 

- कल्पना रामानी

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