रचना चोरों की शामत

Sunday, 11 September 2016

जब से कर ने गही लेखनी

जब से कर ने गही लेखनी
शीश तान चल पड़ी लेखनी

बिन लाँघे देहरी-दीवारें
दुनिया भर से मिली लेखनी

खूब शिकंजा कसा झूठ ने  
मगर न झूठी बनी लेखनी 

हारे छल-बल, रगड़ एड़ियाँ  
कभी न लेकिन झुकी लेखनी

कभी नहीं सम्मान खरीदे
मान बचाती रही लेखनी 

हर मौसम के रंगों में रँग
रही बाँटती खुशी लेखनी

परिचित मुझसे हुआ तभी जग
जब परिचय से जुड़ी लेखनी

जीवन भर अब साथ कल्पना
चिरजीवी चिरजयी लेखनी 

-कल्पना रामानी

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-09-2016) को "खूब फूलो और फलो बेटा नितिन!" (चर्चा अंक-2464)) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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