रचना चोरों की शामत

Friday, 13 March 2015

जब जब नींद बुलाऊँ, चलकर आतीं यादें

चित्र से काव्य तक
जब-जब नींद बुलाऊँ, चलकर आतीं यादें
करवट-करवट बिस्तर पर बिछ जातीं यादें

करूँ बंद यदि दिल-दिमाग के, द्वार खिड़कियाँ
खोल झरोखा मंद-मंद मूस्कातीं यादें

बन पाखी पंखों पर अपने बिठा प्यार से
उड़ अनंत में, पुर-युग याद दिलातीं यादें

चल-चल कर इनके पग शायद कभी न थकते
पर मथ-मथ मेरा मन खूब थकातीं यादें

कभी चुभातीं शूल, कभी फूलों की तरह से  
रस-सुगंध भर हृदय-चमन महकातीं यादें

अगर रुलाई आ, कस ले अपने घेरे में
छेड़ गुदगुदी, खिल-खिल खूब हँसातीं यादें

उलझाकर उर, भूतकाल में जगा रात भर
भोर “कल्पना” नींद साथ ले जातीं यादें 

-कल्पना रामानी 

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-03-2015) को "माँ पूर्णागिरि का दरबार सजने लगा है" (चर्चा अंक - 1917) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कहकशां खान said...

बहुत ही सुंदर और शानदार रचना।

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