
जब तलक है दम, कलम चलती रहेगी
दर्द
दुखियों का गज़ल कहती रहेगी
साज़िशें
लाखों रचे चाहे समंदर
सिर
उठा सरिता मगर बहती रहेगी
जानती
अब नरपिशाचों से निपटना
बेधड़क
बेटी सफर करती रहेगी
बन्दिशों
की बाढ़ हो या सिर कलम हों
प्रेम
की पुरवा सदा बहती रहेगी
क्या
टिकेगी वो कभी सरकार, बोलो
जन-हितों
पर लात जो धरती रहेगी?
रोक
पाएगी क्या सूरज का निकलना
रात
को ढलना ही है, ढलती रहेगी
गम
के बाद आएँगे खुशियों के भी मौसम
‘कल्पना’ यों ज़िन्दगी कटती रहेगी
-कल्पना रामानी
4 comments:
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-01-2016) को "जब तलक है दम, कलम चलती रहेगी" (चर्चा अंक-2216) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सुन्दर प्रस्तुति ।
सुन्दर प्रस्तुति ।
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