रचना चोरों की शामत

Saturday, 26 March 2016

शान से फिर आई होली


सात रंगी ओढ़ चुनरी, शान से फिर आई होली। 
प्रेम रस की गागरी ले, द्वार पर मुस्काई होली।

फागुनी मौसम के धरती से हुए अनुबंध भीगे
सृष्टि का कण-कण भिगोकर, भर रही तरुणाई होली।

आँगनों में, शुभ-शगुन के, मनहरण सतिया सजे हैं
खेत-खलिहानों, वनों, छत-छप्परों पर छाई होली।

खिल उठे तरु, पुष्प, पल्लव, खुशबू से गुलज़ार गुलशन  
जलचरों को, थलचरों को, नभचरों को, भाई होली। 

पिहु-पिहू रटते पपीहे, कुहु-कुहू कोकिल पुकारे
क्यारियों, फुलवारियों, अमराइयों में गाई होली।

जलधि जल में, निर्झरों पर, पर्वतों पर, खाइयों में
पूर्णिमा की चंद्र किरणें, रच रहीं सुखदाई होली।

चार दिन की चाँदनी सब, सौंपकर उपहार हमको
कल्पना आएगी फिर से, चार दिन हरजाई होली।       

-कल्पना रामानी 

2 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 28 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (28-03-2016) को "होली तो अब होली" (चर्चा अंक - 2293) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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