रचना चोरों की शामत

Thursday, 21 March 2013

भरे बाज़ार में

















देखकर सपने छलावों से भरे बाज़ार में।
लुट रही जनता दलालों से भरे बाज़ार में। 
 
चील बन महँगाई ले जाती झपट्टा मारकर
जो कमाते लोग, चीलों से भरे बाज़ार में।
 
लॉटरी, सट्टा, जुआ, शेयर सभी परवान पर
बढ़ रही लालच, भुलावों से भरे बाज़ार में।
 
खल, कुटिल, काले मुखौटों की सफेदी देखकर
जन ठगे जाते, नकाबों से भरे बाज़ार में।
 
जोंक से चिपके हुए हैं तख्त से रक्षक सभी
दे सुरक्षा कौन, जोंकों से भरे बाज़ार में।
 
हारते सर्वस्व फिर भी नित्य लगती बोलियाँ
दाँव है जीवन, बिसातों से भरे बाज़ार में। 


-कल्पना रामानी

9 comments:

surenderpal vaidya said...
This comment has been removed by the author.
surenderpal vaidya said...

बाजारवाद के यथार्थ को बयान करती सुन्दर गजल।

surenderpal vaidya said...

बाजारवाद के यथार्थ को बयान करती सुन्दर गजल।

अभिषेक कुमार अभी said...

आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (13-04-2014) को ''जागरूक हैं, फिर इतना ज़ुल्म क्यों ?'' (चर्चा मंच-1581) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर…

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत खूब !

ana said...

बहुत सुन्दर...वाह

ana said...

बहुत सुन्दर...वाह

sadhana vaid said...

कटु यथार्थ को बयान करती सशक्त प्रस्तुति ! शुभकामनायें !

sunita agarwal said...

waahh ...sundar prastuti :)

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