रचना चोरों की शामत

Saturday, 30 July 2016

द्वार दिल के

द्वार दिल के, तुमने पहरे तो बिठाए
अब अकेलापन तुम्हें ही, खा न जाए। 

बाँट सकता ख़ुशबुएँ गुलशन तभी जब 
गुल हरिक परिवार का, खुल मुस्कुराए। 

पेड़ से माँगोगे फल यदि मार पत्थर
वो भी देगा फेंककर, सब चोट खाए। 

है नज़र कमज़ोर तो चश्मा बदल लो
ज्यों नज़र आएँ न दुश्मन, मित्र-साए। 

जाँच लो किरदार अपना भी जगत में
फिर रहे हो औरों पर, उँगली उठाए। 

यदि बुझानी प्यास है, तो पग बढ़ाओ 
क्यों घड़ा, बढ़कर तुम्हारे, पास आए। 

पाओगे प्रतिदान में भी प्रेम-वाणी  
बोल मृदु तुमने किसी पर, यदि लुटाए। 

पूछ लो बस एक बार, अपने ही मन से
किसलिए तुम कल्पना’, मानव कहाए।  

-कल्पना रामानी

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-08-2016) को "ख़ुशी से झूमो-गाओ" (चर्चा अंक-2419)"मन को न हार देना" (चर्चा अंक-2421) पर भी होगी।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Mansi Khatri said...

Bahut sunder ��

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