रचना चोरों की शामत

Friday, 25 December 2015

नए साल की भोर लो मुस्कुराई


सितारों ने भेजी भुवन को बधाई।
नए साल की भोर, लो मुस्कुराई।

गगन ने किया घोर, कोहरे से स्वागत
चमन ने सुगंधों से देहरी सजाई।

जले नव उमंगों के दिलदार दीपक
भुला बीती बेदिल हवा की ढिठाई।

यही दिन तो देता सकल साल संबल
बनी रहती हर मुख पे लालिम लुनाई।  

चलो कर लें पूरे, सपन इस बरस में
न हो लक्ष्य पाने में कोई ढिलाई।

बिठाएँ नवागत को मन के फ़लक पर 
कि देकर विगत को विहंगम विदाई।

नए जोश से हक़ की, फिर वो मुखर हो
जो आवाज़ कल तक गई थी दबाई।

चेताएँ उन्हें पथ बदल दें पतन का
नराधम निरे, क्रूर, कातिल कसाई। 

फलें कल्पना साल भर प्रार्थनाएँ
मिले रब की सबको, सतत रहनुमाई।

-कल्पना रामानी  

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (27-12-2015) को "पल में तोला पल में माशा" (चर्चा अंक-2203) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति...

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