रचना चोरों की शामत

Thursday, 17 December 2015

नए साल में


खुशियों की नव-ज्योत जगाएँ, नए साल में।
उत्सव मिलकर आज मनाएँ, नए साल में।

कल खोया तो, अब पाने को, डटे रहें हम
भूल पुराना नव अपनाएँ, नए साल में।

काल न रोके कभी रुका, यह सत्य सनातन
साथ उसी के बढ़ते जाएँ, नए साल में।

पुनः जोश से हिम्मत का कर थाम निडर हो
अविजय को जय करके आएँ, नए साल में।

रात उजालों से हारी, हैं सदियाँ साक्षी
तमस काट नव-दीप जलाएँ, नए साल में।
धार इरादों की तीखी हो, प्रण हों पुख्ता
काँटों में भी राह बनाएँ, नए साल में।

शुभ कर्मों से हासिल कर सम्मान "कल्पना"
भारत माँ की शान बढ़ाएँ, नए साल में।

-कल्पना रामानी

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-12-2015) को "सुबह का इंतज़ार" (चर्चा अंक-2195) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Yogi Saraswat said...

स्वागत ! शानदार अल्फ़ाज़ों से सजी गजल ! नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

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