रचना चोरों की शामत

Thursday, 6 August 2015

मानसूनी बारिश के, क्या हसीन नज़ारे हैं

मानसूनी बारिश के, क्या हसीं नज़ारे हैं।
रंग सारे धरती पर, इन्द्र ने उतारे हैं। 

छा गया है बागों में, सुर्ख रंग कलियों पर
तितलियों के भँवरों से, हो रहे इशारे हैं। 

सौंधी-सौंधी माटी में, रंग है उमंगों का
तर हुए किसानों के, खेत-खेत प्यारे हैं।

मेघों ने बिछाया है, श्याम रंग का आँचल
रात हर अमावस है, सो गए सितारे हैं।

सब्ज़ रंगी सावन ने, सींच दिया है जीवन
बूँद-बूँद बारिश ने, मन-चमन सँवारे हैं।

भर दिये हैं रिमझिम ने, प्रेम रंग जन-जन में
मन को बहलाने के, ये सुखद सहारे हैं।

भाव रंग बरखा के, गा रहे सुमंगल गीत
धार-धार अमृत से, तृप्त स्रोत सारे हैं।

ज्यों बदलते मौसम हैं, रंग भी बदल जाते
कल्पना जुड़े इनसे, शुभ दिवस हमारे हैं।

-कल्पना रामानी  

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (08-08-2015) को "ऊपर वाले ऊपर ही रहना नीचे नहीं आना" (चर्चा अंक-2061) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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