रचना चोरों की शामत

Saturday, 13 June 2015

बोल उठा भू का तन प्यासा

चित्र से काव्य तक
बोल उठा भू का तन प्यासा
घन बरसो, जग-जीवन प्यासा

आस लगी इस मानसून पर
रह जाए न कृषक-मन प्यासा

कब से नभ को ताक रहा है
कर तरणी धर, बचपन प्यासा

किलकेंगे प्यारे गुल कितने
अगर न हो कोई गुलशन प्यासा

मंगल वर्षा हो यदि वन में
तरसे क्यों जीवांगन प्यासा

पिहू, कुहू औ मोर चकोरी
का अब तक है नर्तन प्यासा

तैरा करते धनिक साल भर
रह जाता तन-निर्धन प्यासा

जाता है हर मौसम में क्यों  
या अषाढ़ या सावन प्यासा

चाह कल्पना सुनो बादलों  
अब की रहे कोई जीव, न प्यासा 

-कल्पना रामानी 

4 comments:

BADE PAPA said...

बहुत सुन्दर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (15-06-2015) को "बनाओ अपनी पगडंडी और चुनो मंज़िल" {चर्चा अंक-2007} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

शिवनाथ कुमार said...

हमारे तरफ तो बारिश शुरू हो गयी :)
धरा का कोना कोना भीगे तो बढ़िया
बारिश की बूंदों के इन्तेजार में सुन्दर गजल !!
सादर !!

मन के - मनके said...

बरसो रे मेघा---पानी दे,गुरधानी दे--
वो भी सुन रहा है,आशा रखिये.

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