रचना चोरों की शामत

Friday, 6 September 2013

चलो हर कदम सँभलके//गज़ल//















चलो हर कदम सँभल के, कहीं पग फिसल न जाए
जो मिला है आज अवसर, कहीं वो भी टल न जाए।
 
बड़े दिन के बाद आए, ज़रा देर पास बैठो
यूँ न छोड़ जाओ जब तक, मेरा मन सँभल न जाए।
 
जो वफा की खाते कसमें, नहीं उनका कुछ भरोसा
जिसे मन से अपना माना, वही मीत छल न जाए।
 
सुनो प्राणिश्रेष्ठ मानव, करो नेक कर्म भी कुछ
यूँ ही पाप बढ़ गया तो, ये धरा दहल न जाए।
 
ये खिली खिली सी धरती, हमें दे रही हवाला
रहे जल का संतुलन भी, कहीं पौध गल न जाए।
 
करो कैद गीत नगमें, कि गज़ल ने है बुलाया
है ये मंच शायरों का, ये समाँ निकल न जाए।  
 
नहीं व्यर्थ बीत जाएँ, ये तुम्हारे दीद के पल
न झुकाओ तुम निगाहें, कहीं रात ढल न जाए 
  

- कल्पना रामानी

3 comments:

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - रविवार-8/09/2013 को
समाज सुधार कैसे हो? ..... - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः14 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





Meena Pathak said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल

ashu said...

बड़े दिन के बाद आए, ज़रा देर पास बैठो,
यूँ न छोड़ जाओ जब तक, मेरा मन सँभल न जाए।

जो वफा की खाते कसमें, नहीं उनका कुछ भरोसा,
जिसे मन से अपना माना, वही मीत छल न जाए।


सिर्फ इन दो मिसरों के बाकी सब मेरे हिसाब से उत्क्रिस्ट है.

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