रचना चोरों की शामत

Friday, 6 November 2015

ज्योति-दीपक सौख्य का उपहार दीवाली

ज्योति-दीपक सौख्य का उपहार दीवाली।
बाँध लाई गाँठ में फिर प्यार दीवाली।

आस के आखर उभर आए हवाओं में
कर रही धन-देवी का सत्कार दीवाली।

बाँध वंदनवार देहरी अल्पना रचकर 
शोभती हर द्वार पर शुभकार दीवाली।

पीर हर, घर-घर सजाती धीर-बाती संग
कोने-कोने इक दिया क्रमवार दीवाली।

जीतकर मावस पटाखे छोड़ हर्षित हो
सत्य की करती तुमुल जयकार दीवाली।

देह से कितनी हों लंबी दूरियाँ चाहे
जोड़ देती नेह के हिय तार दीवाली।

मेट मन से मैल, मंगल भाव के भूषण
सौंपती है विश्व को, हर बार दीवाली।

पूज लक्ष्मी मातु को पावन सुरों के संग
जग मनाता कल्पना खुशवार दीवाली।

-कल्पना रामानी  

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (08-11-2015) को "अच्छे दिन दिखला दो बाबू" (चर्चा अंक 2154) (चर्चा अंक 2153) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

जमशेद आज़मी said...

बहुत ही सुंदर रचना की प्रस्‍तुति।

Asha Joglekar said...

सुंदर दीपावली।

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