रचना चोरों की शामत

Tuesday, 1 January 2013

जन्मदाता हे पिता तुम


 













जन्मदाता हे पिता तुम, भूमि पर वरदान हो
घर चमन के मुग्ध माली, हम गुलों की जान हो। 
 
शक्त पालक तुम हमारे, मित्र सबसे हो अहम,
गर्व है तुम पर हमें, जीवन की तुम पहचान हो।
  
तेरे संतति प्रेम को है, जानती बेटी तेरी,
फर्ज़ के कटु आवरण में, मोम सी मुस्कान हो।
 
सद्गुणों के सार को, विस्तार तुमसे ही मिला,
जन्म से थे मूढ़ हम, तुम गूढ़ अन्तर्ज्ञान हो।

पा लिए हमने पिता, तुमसे ही सारे संस्कार,
तुम गुरू, शिक्षक तुम्हीं हो, वेद हो व्याख्यान हो।
 
पथ प्रदर्शक तुम हमारे, मंज़िलें तुमसे मिलीं,
गुत्थियों का हल सरलतम, हो गणित, विज्ञान हो।

रक्ष तुमसे संगिनी, बेफिक्र है संतान भी,
तुम कवच परिवार के, पुख्ता अडिग चट्टान हो।


-कल्पना रामानी  

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