रचना चोरों की शामत

मेरे बारे में

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कल्पना रामानी

Friday, 10 November 2023

ढलने लगी है ज़िन्दगी

सांध्य-सूरज की तरह, ढलने लगी है ज़िंदगी।

थाम वैसाखीसफर करने लगी है ज़िंदगी।

 

हर कदम हर वक्त, जो रफ्तार के रथ पर चली

उम्र की इस शाम में, थमने लगी है ज़िंदगी।

 

फूल बन खिलती रही, बाली उमर के बाग में

शूल बनकर अब वही, चुभने लगी है ज़िंदगी।

 

जो ठहाकों से हिलाती थी दरो दीवार को

मूक हो सदियों से यों, लगने लगी है ज़िंदगी।

 

कल धधकती ज्वाल थी, अब शेष हैं चिंगारियाँ

धीरे-धीरे राख बन, बुझने लगी है ज़िंदगी।

 

ख्वाब बन आती रही, रातों को गहरी नींद में

लेकिन अब ख्वाबों से ही, मिटने लगी है ज़िंदगी।

 

जो अडिग चट्टान थी, टुकड़े हुई अब टूटकर

'कल्पना' अब मौत से, डरने लगी है ज़िंदगी।

 

Saturday, 9 November 2019

जो रस्ते क्रूर होते कंटकों वाले

जो रस्ते क्रूर होते, कंटकों वाले
चला करते हैं उनपर, हौसलों वाले

जड़ों से हैं जुड़े तरुवर, ये जो इनको
डरा सकते न मौसम, आँधियों वाले

ये हैं बगुले भगत, जो भोग की खातिर
धरा करते वसन हैं, योगियों वाले

बचो उन पशु नरों से, जालघर पर जो
रचाते भेस अक्सर, नारियों वाले

सजग रहना सदा उन दुश्मनों से तुम
जो रख अंदाज़ मिलते, दोस्तों वाले

तक़ाज़ा देश का है साथ जुट जाओ
भुलाकर भेद मस्जिद, मंदिरों वाले

मुड़े किस ओर जाने मुल्क की किश्ती
कि कर, पतवार पर हैं लोभियों वाले 

बसाओ दिल समय है कल्पना अब भी
कि लौटो छोड़कर घर पत्थरों वाले 

-कल्पना रामानी 

Sunday, 16 July 2017

चर्चित होंगे नाम विश्व में


जो बतियाते सिर्फ कलम से, अँधियारों में। 
वो कब छपते खबरों में या, अखबारों में।

नमन उन्हें जो, धर आते भर नेह उजाला
चुपके से इक दीप, तिमिर के ओसारों में।

राह दिखाते कोहरे-बरखा में जुगनू भी  
आब न होती जब नभ के चंदा तारों में।
     
छल-बल देर-सबेर विजित होंगे निर्बल से
लिप्त रहा करते जो कुत्सित व्यापारों में।

सधा हुआ ही राग बंधु! गाया जाएगा
सत्य-मंच पर गीतों में या अशयारों में।

चर्चित होंगे नाम विश्व में वे भी कल्पना
जो रचते इतिहास घरों की दीवारों में।

- कल्पना रामानी

Monday, 5 June 2017

भोली बिटिया

प्यारी बिटिया के लिए चित्र परिणाम
मेरी प्यारी भोली बिटिया। 
घर भर की हमजोली बिटिया। 

चहक चमन की, महक सदन की
कोयलिया की बोली बिटिया।

पर्वों को जीवंत बनाती
आँगन सजा रँगोली बिटिया।

लँगड़ी, टप्पा, खो-खो, रस्सी
खेल-खेल की टोली बिटिया।

गली-मुहल्ले बाँटा करती
झर-झर हँसी-ठिठोली बिटिया।

देव-दैव्य से माँग दुआएँ
ले आती भर झोली बिटिया।

कड़ुवाहट का नाम न लेती
खट-मिट्ठी सी गोली बिटिया।

नाज़ कल्पनाहर उस घर को
जिस घर माँ! पा! बोली बिटिया। 

- कल्पना रामानी

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