रचना चोरों की शामत

मेरे बारे में

मेरे बारे में
कल्पना रामानी
Showing posts with label विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते. Show all posts
Showing posts with label विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते. Show all posts

Tuesday, 9 July 2013

विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते//गज़ल//





















वे सुना है चाँद पर बस्ती बसाना चाहते।
विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते।
 
लात सीनों पर जनों के, रख चढ़े  थे  सीढ़ियाँ,
शीश पर अब पाँव रख, आकाश पाना चाहते।
 
भर लिए गोदाम लेकिन, पेट भरता ही नहीं,
दीन-दुखियों को निवाला, अब बनाना  चाहते।
 
बाँटते वैसाखियाँ, जन-जन को पहले कर अपंग,
दर्द देकर बेरहम, मरहम लगाना चाहते।
 
खूब दोहन कर निचोड़ा, उर्वरा भू को प्रथम,   
अब जनों के कंठ ही, शायद सुखाना चाहते।  
 
शहरियत से बाँधकर, बँधुआ किये ग्रामीण जन,  
निर्दयी, गाँवों की अब, जड़ ही मिटाना चाहते।  
 
सिर चढ़ी अंग्रेज़ियत, देशी  दफन कर बोलियाँ,
बदनियत फिर से, गुलामी को बुलाना चाहते।
 
देश जाए या रसातल, या हो दुश्मन के अधीन,
दे हवा आतंक को, कुर्सी बचाना चाहते।
 
कोशिशें नापाक उनकी, खाक कर दें "कल्पना",
खाक में जो स्वत्व जन-जन का मिलाना चाहते। 




-----कल्पना रामानी

समर्थक

सम्मान पत्र

सम्मान पत्र