रचना चोरों की शामत

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कल्पना रामानी
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Friday, 28 November 2014

फूलों से खुशबू लेकर


फूलों से खुशबू लेकर खिलने का वादा।
 खुद से कर लो जीवन भर हँसने का वादा।
 
 बन आँसू बोझिल हों पलकें अगर तुम्हारी
 बुझे पलों से करो पुलक बनने का वादा।
 
करना होगा अगम जलधि की जलधारा से
 मझधारा में कभी नहीं फँसने का वादा।
 
चलते-चलते पाँव फिसलने लगते हों यदि
 करो उस जगह कभी न पग धरने का वादा।
 
आँख दिखाती जीवन-पथ की चट्टानों को
 चूर चूर कर हो आगे बढ़ने का वादा।
 
टूटे यह अनुबंध तुम्हारा कभी न खुद से
 वादों पर हो सदा अडिग चलने का वादा।
 
फिर-फिर मिलता नहीं कल्पनामानव-जीवन
मन से हो इंसान बने रहने का वादा।

-कल्पना रामानी  

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