उँगलियों से यूँ न मसलो, फूल कहता है।
देख मुझको क्यारियों में, बाल खुश कितने!
प्रेम से फुलवारी सींचो, फूल कहता है।
बाँधकर जूड़े में क्यों तुम, प्राण हरते हो?
छेदकर मत हार गूँथो, फूल कहता है।
रौंदते हो पग तले, निर्दय हो क्यों इतने ?
यूँ प्रदूषण मत बढ़ाओ, फूल कहता है।
ईश भी नहीं चाहता कृति, नष्ट हो उसकी।
मंदिरों में दम न घोंटो, फूल कहता है।
शूल भी करते सुरक्षा, बन मेरे साथी।
तुम मनुष हो, कुछ तो सोचो, फूल कहता है।
नष्ट तो होना ही है यह, सच है जीवन का।
वक्त से पहले न मारो, फूल कहता है।
मैं तो हूँ पर्यावरण का, एक सेवक ही।
शुद्ध साँसों को सहेजो, फूल कहता है।
सूखकर गुलशन में बिखरूँ, शेष है चाहत।
बीज मेरे फिर से रोपो, फूल कहता है।
- कल्पना रामानी
