रचना चोरों की शामत

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कल्पना रामानी
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Thursday, 15 October 2015

मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित


माँ दुर्गा के लिए चित्र परिणाम
सकल विश्व में फैली चारों ओर जीव हित। 
मंगलकारी मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित।

जब-जब आती पाप-लोभ की बाढ़ जगत में
नव-दुर्गा तब प्राण हमारे करती रक्षित।   

मनता जब नवरात्रि-पर्व हर साल देश में
दिव्य प्रभा से मिट जाता सारा तम दूषित।

घटस्थापना, जगराते, माहौल बनाते
जिसमें होते सकल दुष्टतम भाव विसर्जित।

चलता दौर उपवास भजन का जब तक घर-घर
माँ देवी से माँगे जाते, वर मनवांछित। 
     
देशबंधुओं, नाम देश का पर्वों से ही     
विश्व-फ़लक पर स्वर्ण अक्षरों में है अंकित।

अमर रहें ये परम्पराएँ, युगों “कल्पना”  
अजर रहे यह संस्कारों की ज्योत-अखंडित। 

- कल्पना रामानी  

Tuesday, 16 September 2014

हर खुशी तुमसे पिता


घर चमन में झिलमिलाती, रोशनी तुमसे पिता
ज़िंदगी में हमने पाई, हर खुशी तुमसे पिता
 
छत्र-छाया में तुम्हारी, हम पले, खेले, बढ़े
इस अँगन में प्रेम की, गंगा बही तुमसे पिता
 
गर्व से चलना सिखाया, तुमने उँगली थामकर 
ज़िंदगी पल-पल पुलक से, है भरी तुमसे पिता
 
याद हैं बचपन की बातें, जागती रातें मृदुल
ज्ञान की हर बात जब, हमने सुनी तुमसे पिता
 
प्रेरणा भयमुक्त जीवन की, सदा हमको मिली
नित नया उत्साह भरती, हर घड़ी तुमसे पिता
 
हाथ माथे है तुम्हारा, हम बड़े हैं खुशनसीब
घर-गृहस्थी में घुली है, माधुरी तुमसे पिता  
 
हर बला से दूर रखता, बल तुम्हारा ही हमें     
कल्पना जग में सुरक्षा, है मिली तुमसे पिता

-कल्पना रामानी

Sunday, 11 May 2014

माँ की दुआ



ब्रह्म के ब्रह्मांड पर, उपकार है माँ की दुआ।
दैव्य से हमको मिला, उपहार है माँ की दुआ।
 
भोग भव के हैं सभी, फीके अगर संतान को
मिल न पाए जो भुवन का, सार है माँ की दुआ।
 
माँ के होते छू लें हमको, कटु हवाएँ, क्या मजाल
पीर से माँगी हुई, मनुहार है माँ की दुआ।
 
शक्ति का यह वृत्त है, संतान को घेरे हुए
काल भी झुकता ये वो, दरबार है माँ की दुआ।
 
ज़िंदगी का पुण्य हर, करती है अर्पण माँ हमें
प्रार्थनाओं से भरा, आगार है माँ की दुआ। 
 
व्याधियों में संग रहती, है सदा साया बनी
हर तरह की व्याधि का, उपचार है माँ की दुआ।
 
भाँप लेती मुश्किलों को, ओट से अज्ञात की
बन कवच आ जाती ऐसा, प्यार है माँ की दुआ।
 
लाख हों दुश्मन बली, पर है हमारी जय अभंग
साथ बलशाली अगर, तलवार है माँ की दुआ।
 
छोडकर इह लोक माँ, चाहे बसे परलोक में
पर सदा हमसे जुड़ा, वो तार है माँ की दुआ।
 
अर्ज़ है यह कल्पना’, सुख सर्व को माँ का मिले
हर सुखी परिवार का, आधार है माँ की दुआ।  


-कल्पना रामानी

Tuesday, 1 January 2013

जन्मदाता हे पिता तुम


 













जन्मदाता हे पिता तुम, भूमि पर वरदान हो
घर चमन के मुग्ध माली, हम गुलों की जान हो। 
 
शक्त पालक तुम हमारे, मित्र सबसे हो अहम,
गर्व है तुम पर हमें, जीवन की तुम पहचान हो।
  
तेरे संतति प्रेम को है, जानती बेटी तेरी,
फर्ज़ के कटु आवरण में, मोम सी मुस्कान हो।
 
सद्गुणों के सार को, विस्तार तुमसे ही मिला,
जन्म से थे मूढ़ हम, तुम गूढ़ अन्तर्ज्ञान हो।

पा लिए हमने पिता, तुमसे ही सारे संस्कार,
तुम गुरू, शिक्षक तुम्हीं हो, वेद हो व्याख्यान हो।
 
पथ प्रदर्शक तुम हमारे, मंज़िलें तुमसे मिलीं,
गुत्थियों का हल सरलतम, हो गणित, विज्ञान हो।

रक्ष तुमसे संगिनी, बेफिक्र है संतान भी,
तुम कवच परिवार के, पुख्ता अडिग चट्टान हो।


-कल्पना रामानी  

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