रचना चोरों की शामत

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कल्पना रामानी
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Saturday, 18 April 2015

खुशबू देते कोमल फूलों जैसे रिश्ते

खुशबू देते कोमल फूलों जैसे रिश्ते
ना जाने क्यों आज बन गए काँटे रिश्ते

सहलाते थे दर्द दिलों का मरहम लाकर
अब महरूम हुए हाथों से गहरे रिश्ते

खिल जाते थे नैन चार होते ही जो कल
नैन मूँद बन जाते अब, अनजाने रिश्ते

बूँद-बूँद से बरसों में जो हुए समंदर
बाँध पलों में तोड़ बने बंजारे रिश्ते

हरे भरे रहते थे भर पतझड़ में भी जो
अब सावन में भी दिखते हैं सूखे रिश्ते

तकरारों में पूर्व बनी माँ, पश्चिम बाबा   
सुपर सपूतों ने कुछ ऐसे बाँटे रिश्ते

नादानी थी या शायद धन-लोभ “कल्पना”
गाँव-गली से बिछड़ गए जो प्यारे रिश्ते 

-कल्पना रामानी 

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